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हमने देखा था शौक-ऐ-नजर की खातिर...!!

ये न सोचा था के तुम दिल मैं उतर जाओगे..!!!

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लफ्जो की कमी हैं आजकल..!
दिल कि मरम्मत चल रही हैं ..!! 

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 लिख तू कुछ ऐसा ऐ-दिल, जिसे पढ़..!
वो रोये भी ना और, रात भर सोये भी ना..!!

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 ख्वाहिश तो थी मिलने की… पर कभी कोशिश नही की..!
सोचा के जब खुदा माना है तुजको तो बिन देखे ही पूजेंगे...!!

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 मैकदे बंद करे चाहे लाख जमाने वाले .!
शहर में कम नहीं आँखों से पिलाने वाले ..!!

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अल्फ़ाज़ चुराने की ज़रूरत ही ना पड़ी कभी..!
तेरे बे-हिसाब ख्यालों ने बे-तहाशा लफ्ज़ दिए..!!

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 मुझे खींच ही लेती है हर बार उसकी मोहब्बत..!
वरना बहुत बार मिला हूँ आखिरी बार उससे...!!

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 ऐ समन्दर..!
मैं तुझसे वाकिफ नहीं हूँ मगर इतना बताता हूँ,
वो आँखें तुझसे ज़्यादा गहरी हैं जिनका मैं आशिक हूँ. 

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शायद तेरा ‪नजरिया‬ मेरे ‎ नजरिए ‬से अलग था,.!
तू‎ वक्त‬ गुजार ना चाहती थी, और मे ‪जिन्दगी‬ ..!!

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 छीन कर हाथो से सिगार वो कुछ इस अंदाज़ से बोली..!
कमी क्या है इन होठोंमें जो तुम सिगरेट पीते हो...!!

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 आईने में वो देख रहे थे बहार-ए-हुस्न..!
आया मेरा ख़याल तो शर्मा के रह गए,..!! 

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 ना जाने वो आइना कैसे देखते होंगे..!
जिसकी आखो को देख दुनिया फना हैं,..!!

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मुझसे इश्क किया है तो वफ़ा का वादा भी करो .!
मैं बिखरना नहीं चाहता टूटे हुवे काँच की तरह.!!

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बहुत लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ में..!

किसी से कुछ कहने की चाहत में..!!

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कोशिश बहुत थी कि राजे अहसास बयाँ न हो.!

पर मुमकिन कहाँ था कि आग लगे और धुआँ न हो..!!

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 एक हालत पर न रहने पायी दिल की हसरते..!
तुमने जब देखा नए अंदाज से देखा मुझे...!!

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हिचकियों में वफ़ा ढूँढ रहा था..!
कमबख्त गुम हो गई दो घूँट पानी से....!! 

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 मत दे दुआ किसी को अपनी उमर लगने की, 
यहाँ ऐसे भी लोग है जो तेरे लिए जिन्दा हैं. 

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 कोई बेसबब , कोई बेताब ,कोई चुप ,कोई हैरान .!

तेरी महफ़िल के तमाशे ख़तम नहीं होते .!!! 

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 कोई बेसबब , कोई बेताब ,कोई चुप ,कोई हैरान ,तेरी महफ़िल के तमाशे ख़तम नहीं होते ,.,,!!! 


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लिख तू कुछ ऐसा ऐ-दिल,जिसे पढ़...!
वो रोये भी ना और, रात भर सोये भी ना...!!

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 मैकदे बंद करे चाहे लाख जमाने वाले 
शहर में कम नहीं आँखों से पिलाने वाले 

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अल्फ़ाज़ चुराने की ज़रूरत ही ना पड़ी कभी;
तेरे बे-हिसाब ख्यालों ने बे-तहाशा लफ्ज़ दिए। 

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 मुझे खींच ही लेती है हर बार उसकी मोहब्बत, 
वरना बहुत बार मिला हूँ आखिरी बार उससे। 


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मुकम्मल थी वो गुफ्तगू बिना अल्फाज़ों के भी कुछ यूं,
उसकी उंगलियाँ बोल रही थीं उनकी ज़ुल्फ़ों से.!!

 

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 अक्सरपूछते है लोग, किसके लिए लिखते हो …??
अक्सर कहता है दिल…..”काश कोई होता”…!!


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 उस शक्श से फ़क़त  इतना सा ताल्लुक हैं मेरा ..!
वो परेशान होता है तो मुझे नींद नही आती है ..!! 


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 ऐसा नहीं है कि अब तेरी जुस्तजू नहीं रही..!  
बस टूट-टूट कर बिखरने की हिम्मत नहीं रही!!


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आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें..!

दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की..!!


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 बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए..!

दिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है..!!


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 दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे

जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे


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 बदल जाती हो तुम, कुछ पल साथ बिताने के बाद..!
यह तुम मोहब्बत करती हो या नशा…!! 


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 तेरे एक-एक लफ्ज़ को हज़ार मतलब पहनाये हमने…
चैन से सोने ना दिया तेरी अधूरी बातों ने… 


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 आदत हो गयी है तेरे करीब रहने की……
तेरी सांसो की खुशबु वाला इत्र मिलता है कही….!!!? 


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 तारों से कह दो कि वो टूट गिरे मेरे हाथों में,
माँगता है यार मेरा मुझसे उन्हें अक्सर रातों में….!!!! 


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 दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है..!

ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया...!!


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 यूँ तो मसले और मुद्दे बहुत हैं …….लिखने को मगर ...!

कमबख्त़ इन कागज़ों को तेरा ही ,,,ज़िक्र अज़ीज़ है !!

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लाजिमी नहीं की आपको आँखों से ही देखुं।
आपको सोचना आपके दीदार से कम नहीं।। 

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तुम सामने आये तो, अजब तमाशा हुआ..!

हर शिकायत ने जैसे, खुदकुशी कर ली..!!

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 पर्दा तो होश वालों से किया जाता है .!
बेनकाब चले आओ हम तो नशे में है..!! 

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 तुम्ही ने छुआ होगा…!
हवा यूँ बेवजह कभी नहीं महकी....!!

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 हमको तो बेजान चीज़ों पर भी प्यार आता है….यारा..!
तुझमें तो फिर भी मेरी जान बसी है….!!

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 ये तो सच हैं की हमे चाहने वाले बहोत हैं..!
पर ये हमारी जिद थी की हमे सिफ्र तु चाहै…!!

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 सो जाऊ के तेरी याद में खो जाऊ…
ये फैसला भी नहीं होता और सुबह हो जाती है… 

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 दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है..!

और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता..!!

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दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ़ तो हुई..!

लेकिन तमाम उम्र को आराम हो गया..!!

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 रात भर चलती रहती है उँगलियाँ मोबाइल पर..!
किताब सीने पे रखकर सोये हूए एक जमाना हो गया…!! 

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ये तो सच हैं की हमे चाहने वाले बहोत हैं..! पर ये हमारी जिद थी की हमे सिफ्र तु चाहै…!!

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लिखी कुछ शायरी ऐसे तेरे नाम से..कि जिस ने तुम्हें देखा नहीं,वो भी तुम्हें बेमिसाल हने लगे है….

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 करीब आने की कोशिश तो मैं करूँ लेकिन..!
हमारे बिच कोई फ़ासला दिखाई तो दे !!! 

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 तुझको देखा तो फिर उसको ना देखा ग़ालिब..!
चाँद कहता रह गया, मैं चाँद हूँ मैं चाँद हूँ…!!

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 जब कभी टूट कर बिखरो तो बताना हमको..!
हम तुम्हें रेत के जर्रों से भी चुन सकते हैं।...!!

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 फिर उसने मुस्कुरा के देखा मेरी तरफ़..!
फिर एक ज़रा सी बात पर जीना पड़ा मुझे..!!

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अब हम इश्क के उस मुक़ाम पर आ चुके हैं..!
जहां दिल किसी और को चाहे भी तो गुनाह होता है...!!

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 खूबिओं से नहीं होती मोहब्बत भी सदा..!
कमियों से भी अक्सर प्यार हो जाता है” ...!!

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 कांटे तो नसीब में आने ही थे..!
फूल जो हमने गुलाब चुना था...!! 

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 ग़म वो मय-ख़ाना कमी जिस में नहीं..!

दिल वो पैमाना है भरता ही नहीं..!!

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सिर्फ लफ़्ज़ों को न सुनो, कभी आँखें भी पढो ..!
कुछ सवाल बड़े खुद्दार हुआ करते है… !!

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 मत किया करिये दिन के उजालों की ख्वाहिशें ऐ हजूर..!
ये आशिक़ों की बस्तियाँ हैं यहाँ सूरज से नहीं, दीदार से दिन निकलता हैं...!!!

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 दिल से बाहर निकलने का रास्ता तक ना ढूंढ सकी वो,
दावा करती थी जो मेरी रग रग से वाकिफ होने का…!!

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 कौन कहता है कि दिल सिर्फ लफ्जों से दुखाया जाता है;
तेरी खामोशी भी कभी कभी आँखें नम कर देती है… 

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थोड़ी बहुत मुहब्बत से काम नहीं चलता ऐ दोस्त..!
ये वो मामला है जिसमें या सब कुछ या कुछ भी नहीं..!! 

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 जीँदगी हो या शतरंज, मजा तभी है दोस्त,…!
जब रानी मरते दम तक साथ हो……!!

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 जो निगाह-ए-नाज़ का बिस्मिल नहीं..!!

दिल नहीं वो दिल नहीं वो दिल नहीं..!!!

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“हम तो फना हो गए उनकी आँखे देखकर..!

ग़ालिब ना जाने वो आइना कैसे देखते होंगे”..!!


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इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’ कि ..!

लगाए न लगे और बुझाए न बने ..!!

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शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ..!

दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का..!!

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कोई ताल्लुक न जोड़ो मगर सामने तो रहो..!!

तुम अपने गुरूर में खुश, और हम अपने सुरूर में खुश..!!

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हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है 

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एक  लफ्ज़  है मोहब्बत
इसे कर के तो  देखो !
तुम   तड़प  ना  जाओ  तो  कहना !!

एक  लफ्ज़  है मुक़द्दर
इससे  लड़ कर  तो  देखो !
तुम  हार  न  जाओ  तो  कहना !!

एक  लफ्ज़  है वफ़ा
ज़माने  में  नहीं  मिलती !
कहीं  ढून्ढ  पाओ तो  कहना !!

एक  लफ्ज़  है आंसू
दिल  में  छुपा  कर तो  देखो !
तुम्हारी  आँखों  से  न  निकले  तो  कहना !!

एक  लफ्ज़  है जुदाई
इसे सह कर  तो देखो !
तुम  टूट  के  बिखर  ना जाओ  तो कहना !!

एक  लफ्ज़  है खुदा
उसे  पुकार  कर  तो  देखो !
सब  कुछ  पा  ना  लो  तो कहना !!!

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उसको रब से इतनी बार माँगा है
की अब हम सिर्फ हाथ उठाते है तो
सवाल फ़रिश्ते खुद ही लिख लेते है । 

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 उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है 

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बहुत अजीब हैं तेरे बाद की,, ये बरसातें भी..!

हम अक्सर बन्द कमरे मैं भीग जाते हैं…!!

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 तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब 
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे 

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 तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब 
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे 

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 इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा,
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं। 

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खवाहिश नही मुझे मशहुर होने की….

तुम मुझे पहचानते हो, बस इतना ही काफी है..


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कुछ तो बात है उसकी फीतरत मै,

वरना उसे चाहने की खता हम बार-बार न करते…!!!

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उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया..!

देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया..!!

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अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में

जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में

 “रातों को आवारगी की आदत तो हम दोनों में थी.!!
अफ़सोस चाँद को ग्रहण और मुझे इश्क हो गया.!!” 

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 तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब .!
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे ..!!

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 खुदा के वास्ते पर्दा न रुख्सार से उठा ज़ालिम..!
कहीं ऐसा न हो जहाँ भी वही काफिर सनम निकले ..!!

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 तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब ..!!
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे ...!!!

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 कल रात उसको ख्वाब मे गले से लगाया था मैने!

आज दिन भर मेरे दोस्त मेरी महक का राज पूछते रहे…!!!

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 बड़ा मीठा नशा था उसकी याद का..!
वक्त गुजरता गया और हम आदी होते गए..!!! 

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