Zakir Khan – The Sakht Launda of Indian Comedy
Zakir Khan is one of India's most beloved stand-up comedians, poets, and storytellers. Known for his unique blend of humor, relatable storytelling, and poetic expressions, he has carved a niche for himself in the world of Indian comedy.
Zakir Khan is not just a comedian; he is an emotion for his fans. His journey from struggles to stardom is a testament to hard work, passion, and staying true to one's roots. His mix of humor and poetry makes him stand out as one of India's finest comedians.
Early Life & Background
Zakir Khan was born on 20 August 1987 in Indore, Madhya Pradesh, into a family of musicians. His grandfather, Ustad Moinuddin Khan, was a renowned classical musician, which influenced Zakir's early interest in art and storytelling. However, he found his true calling in comedy.
Rise to Fame
Zakir gained national recognition when he won Comedy Central India's Best Stand-up Comedian competition in 2012. His career skyrocketed with viral performances on platforms like AIB (All India Bakchod), Amazon Prime Video, and YouTube. His famous catchphrase "Sakht Launda" (a guy who doesn’t fall for girls easily) became a cultural phenomenon.
Style & Unique Appeal
Zakir's comedy is deeply rooted in Indian middle-class life, relationships, and social observations.
His storytelling format, infused with emotions and humor, makes his content relatable to a vast audience.He often blends shayari (poetry) with stand-up, giving his performances a unique charm.
Popular Shows & Specials
Haq Se Single (2017) – A hilarious take on love, heartbreaks, and being single.
Tathastu (2022) – A deeply emotional and humorous reflection on his life and struggles.
Chacha Vidhayak Hain Humare – A comedy web series where he plays a young man pretending to have political connections.
Why People Love Him?
His ability to connect with the audience through everyday experiences.
A mix of desi charm, wit, and heartfelt emotions in his performances.
His inspiring journey from a small-town boy to a comedy icon.
बहुत मासूम सी यह लड़की है इश्क की बात नहीं समझती
बहुत मासूम सी यह लड़की है इश्क की बात नहीं समझती।।
ना जाने किस दिन में खोई रहती हैं मेरी रात नहीं समझती
हाँ .. ह्म्म .... सही बात हैं ...... तो कहती हैं
हाँ .. ह्म्म .... सही बात हैं ...... तो कहती हैं
अल्फाज़ तो समझलेतीं हैं लेकिन जज़्बात नहीं समझती।।
Bahut masoom si yeh ladki hai ishq ki baat nahi samajhti
Bahut masoom si yeh ladki hai ishq ki baat nahi samajhti।।
Na jaane kis din mein khoyi rehti hai meri raat nahi samajhti
Haan .. hmmm .... sahi baat hai ...... to kehti hai
Haan .. hmmm .... sahi baat hai ...... to kehti hai
Alfaaz to samajh leti hai lekin jazbaat nahi samajhti।।
हर एक कॉपी के पीछे, कुछ न कुछ ख़ास लिखा है,
बस इस तरह तेरे मेरे इश्क़ का इतिहास लिखा है,
तू दुनिया में चाहे जहाँ भी रहे,
अपनी डायरी में मैंने तुझे पास लिखा है।
Har ek copy ke peeche, Kuch na Kuch Khaas likha hai,
Bas Is tarah tere mere Ishq ka itihaas likha hai,
Tu Duniya main chahe jahan bhi rahe,
Apni diary mei maine tujhe pass likha hai
माना कि तुमको इश्क़ का तजुर्बा भी कम नहीं,
हमने भी बाग़ में हैं कई तितलियाँ उड़ाई...
Mana ki tumko ishq ka tajurba bhi kam nahi,
Humne bhi baag mein hain kai titliyan udaai...
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कामयाबी हमने तेरे लिए खुद को यूँ तैयार कर लिया,
मैंने हर जज़्बात बाज़ार में रख कर इश्तेहार कर लिया..
Kaamyabi humne tere liye khud ko yun tayyar kar liya,
Maine har jazbaat bazaar mein rakh kar ishtahaar kar liya..
ज़िंदगी से कुछ ज़्यादा नहीं, बस इतनी सी फ़रमाइश है,
अब तस्वीर से नहीं, तफ़्सील से मिलने की ख़्वाहिश है..
Zindagi se kuch zyada nahi, Bas itni si farmaish hai,
Ab tasveer se nahi, Tafseel se milne ki khwahish hai..
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बस का इंतज़ार करते हुए, मेट्रो में खड़े खड़े रिक्शा में बैठे हुए गहरे शुन्य में क्या देखते रहते हो?
गुम्म सा चेहरा लिए क्या सोचते हो? क्या खोया और क्या पाया का हिसाब नहीं लगा पाए न इस बार भी? घर नहीं जा पाए न इस बार भी?
Bus ka intezaar karte hue, Metro mein khade khade Rickshaw mein baithe hue Gehre shunya mein kya dekhte rehte ho?
Gumm sa chehra liye kya sochte ho? Kya khoya aur kya paaya ka hisaab nahi laga paaye na is baar bhi? Ghar nahi ja paaye na is baar bhi?
उसे मैं क्या, मेरा खुमार भी मिले तो बेरहमी से तोड़ देती है,
वो ख्वाब में आती है मेरे, फिर आकर मुझे छोड़ देती है….
Use main kya, mera khumaar bhi mile to berahmi se tod deti hai,
Woh khwaab mein aati hai mere, phir aakar mujhe chhod deti hai….
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इश्क़ को मासूम रहने दो नोटबुक के आखिरी पन्ने पर,
आप उसे किताबो में डालकर मुश्किल न कीजिये..
Ishq ko masoom rehne do notebook ke aakhiri panne par,
Aap use kitabon mein daalkar mushkil na kijiye..
अब वो आग नहीं रही, न शोले-सा दहकता हूँ,
रंग सभी के जैसा है, सबसे ही तो महकता हूँ।
एक अरसे से थामे हूँ कश्ती भँवर के बीच,
तूफ़ान से नहीं, अब साहिल से डरता हूँ।
Ab wo aag nahin rahi, na sholon-sa dahakta hoon,
Rang sabhi ke jaisa hai, sabse hi to mehakta hoon.
Ek arse se thaame hoon kashti bhanwar ke beech,
Toofan se nahin, ab saahil se darta hoon.
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मेरे कुछ सवाल हैं जो सिर्फ क़यामत के रोज़ पूछूंगा तुमसे
क्योंकि उसके पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके इस लायक नहीं हो तुम।
Mere kuch sawaal hain jo sirf qayaamat ke roz poochoonga tumse
kyunki uske pehle tumhaari aur meri baat ho sake is laayak nahin ho tum।
मैं शून्य पे सवार हूँ बेअदब सा मैं खुमार हूँ
अब मुश्किलों से क्या डरूं मैं खुद कहर हज़ार हूँ
मैं शून्य पे सवार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ
उंच-नीच से परे मजाल आँख में भरे
मैं लड़ रहा हूँ रात से मशाल हाथ में लिए
न सूर्य मेरे साथ है तो क्या नयी ये बात है
वो शाम होता ढल गया वो रात से था डर गया
मैं जुगनुओं का यार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ
मैं शून्य पे सवार हूँ भावनाएं मर चुकीं
संवेदनाएं खत्म हैं अब दर्द से क्या डरूं
ज़िन्दगी ही ज़ख्म है मैं बीच रह की मात हूँ
बेजान-स्याह रात हूँ मैं काली का श्रृंगार हूँ
मैं शून्य पे सवार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ
हूँ राम का सा तेज मैं लंकापति सा ज्ञान हूँ
किस की करूं आराधना सब से जो मैं महान हूँ
ब्रह्माण्ड का मैं सार हूँ मैं जल-प्रवाह निहार हूँ
मैं शून्य पे सवार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ
मेरी जमीन तुमसे गहरी रही है,
वक़्त आने दो, आसमान भी तुमसे ऊंचा रहेगा।
Meri zameen tumse gehri rahi hai,
waqt aane do, aasmaan bhi tumse ooncha rahega.
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लूट रहे थे खजाने मां बाप की छाव मे,
हम कुड़ियों के खातिर, घर छोड़ के आ गए।
Loot rahe the khazaane maa-baap ki chhaav mein,
hum kudiyon ke khaatir, ghar chhod ke aa gaye.
मेरी औकात मेरे सपनों से इतनी बार हारी हैं
के अब उसने बीच में बोलना ही बंद कर दिया है।
Meri aukaat mere sapno se itni baar haari hai ke
ab usne beech mein bolna hi band kar diya hai.
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ज़मीन पर आ गिरे जब आसमां से ख़्वाब मेरे
ज़मीन ने पूछा क्या बनने की कोशिश कर रहे थे।
Zameen par aa gire jab aasmaan se khwaab mere,
zameen ne poochha — kya banne ki koshish kar rahe the?
गर यकीन ना हों तो बिछड़ कर देख लो
तुम मिलोगे सबसे मगर हमारी ही तलाश में।
Gar yaqeen na ho to bichhad kar dekh lo,
tum miloge sabse magar hamari hi talash mein.
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ये तो परिंदों की मासूमियत है,
वरना दूसरों के घर अब आता जाता कौन हैं।
Yeh to parindon ki maasoomiyat hai,
warna doosron ke ghar ab aata jaata kaun hai.
बड़ी कश्मकश में है ये जिंदगी की,
तेरा मिलना मिलना इश्क़ था या फरेब।
Badi kashmakash mein hai ye zindagi ki,
tera milna milna ishq tha ya fareb.
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दिलों की बात करता है ज़माना,
पर आज भी मोहब्बत
चेहरे से ही शुरू होती हैं।
Dilon ki baat karta hai zamaana,
par aaj bhi mohabbat
chehre se hi shuru hoti hai.
Qayamat ki Raat Lyrics
मेरे कुछ सवाल हैं जो सिर्फ क़यामत के रोज़ पूछूंगा तुमसे
क्योंकि उसके पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके इस लायक नहीं हो तुम।
मैं जानना चाहता हूँ, क्या रकीब के साथ भी चलते हुए शाम को यूं हीे
बेखयाली में उसके साथ भी हाथ टकरा जाता है तुम्हारा, क्या अपनी छोटी ऊँगली से
उसका भी हाथ थाम लिया करती हो क्या वैसे ही जैसे मेरा थामा करती थीं
क्या बता दीं बचपन की सारी कहानियां तुमने उसको जैसे मुझको
रात रात भर बैठ कर सुनाई थी तुमने क्या तुमने बताया उसको कि पांच के आगे की
हिंदी की गिनती आती नहीं तुमको वो सारी तस्वीरें जो तुम्हारे पापा के साथ,
तुम्हारे भाई के साथ की थी, जिनमे तुम बड़ी प्यारी लगीं, क्या उसे भी दिखा दी तुमने
ये कुछ सवाल हैं जो सिर्फ क़यामत के रोज़ पूँछूगा तुमसे
क्योंकि उसके पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके इस लायक नहीं हो तुम
मैं पूंछना चाहता हूँ कि क्या वो भी जब घर छोड़ने आता है तुमको
तो सीढ़ियों पर आँखें मीच कर क्या मेरी ही तरह उसके भी सामने माथा
आगे कर देती हो तुम वैसे ही, जैसे मेरे सामने किया करतीं थीं
सर्द रातों में, बंद कमरों में क्या वो भी मेरी तरह तुम्हारी नंगी पीठ पर
अपनी उँगलियों से हर्फ़ दर हर्फ़ खुद का नाम गोदता है, और क्या तुम भी
अक्षर बा अक्षर पहचानने की कोशिश करती हो जैसे मेरे साथ किया करती थीं
मेरे कुछ सवाल हैं जो सिर्फ क़यामत के रोज़ पूछूगा तुमसे क्योंकि उसके पहले
तुम्हारी और मेरी बात हो सके इस लायक नहीं हो तुम।
Zakir Khan | Jashn-e-Rekhta 2017
Hota Hai Shab-o-Roz Tamasha Mire Aage: Stand-up Comedian Zakir Khan Live at Jashn-e-Rekhta 2017
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Zakir khan shayari | umeed podcast shayari collection
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